दूरदर्शन के 58 साल पर विशेष लेख : दूरदर्शन का आज भी कोई सानी नहीं है

प्रदीप सरदाना, लेखक पिछले लगभग 40  वर्षों से राजनीति, संचार,  स्वास्थ्य, परिवहन, पर्यटन, जल, शिक्षा आदि के साथ सिनेमा और टीवी जैसे विषयों पर भी देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्र पत्रिकाओं में नियमित लिख रहे हैं। लेखक टीवी पर नियमित लिखने वाले देश के पहले पत्रकार भी है। 

टेलीविजन का आविष्कार यूँ तो जॉन एल बिलियर्ड ने 1920 के दौर में ही कर दिया था।  लेकिन भारत में यह टीवी तब पहुंचा जब 15 सितम्बर 1959 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने दिल्ली में एक प्रसारण सेवा दूरदर्शन का उद्घाटन किया। हालांकि तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह दूरदर्शन, यह टीवी आगे चलकर जन जन की जिंदगी का अहम हिस्सा बन जाएगा। आज यह टीवी रोटी कपड़ा और मकान के बाद लोगों की चौथी ऐसी जरुरत बन गया है कि जिसके बिना जिंदगी मुश्किल और सूनी सी लगती है।

नोट : दूरदर्शन के 58 साल पर विशेष लेख (15-सितम्बर, 2017), PIB का संस्करण है लेकिन इसकी प्रासंगिगता को देखते हुए इसे IASmind पर निबंध की श्रेणी में रखा जा रहा है, सूत्र की सहायता से. धन्यवाद.

आज का अपडेट जानें  : 

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चीन की सरकार ने अपने सैनिकों को दिया संदेश, कहा- भारत प्रतिद्वंदी, पर दुश्मन नहीं

असम में नया कानूनः माता-पिता की देखभाल नहीं की तो हर महीने कटेगा वेतन

वही दूरदर्शन अपने जीवन के 58 बरस पूरे कर चुका है. इतने बरसों में दूरदर्शन का,टीवी का अपने देश में इतना विकास हुआ है कि इसे देखना जीवन की एक आदत ही नहीं जरुरत बन गया है। हालांकि शुरूआती बरसों में दूरदर्शन का विकास बहुत धीमा था. शुरूआती बरसों में इस पर आधे घंटे का नाम मात्र प्रसारण होता था। पहले इसे स्कूली शिक्षा के लिए स्कूल टेलीविजन के रूप में शुरू किया गया।  लेकिन इसका 500 वाट का ट्रांसमीटर दिल्ली के मात्र 25 किमी क्षेत्र में ही प्रसारण करने में सक्षम था।  तब सरकार ने दिल्ली के निम्न और माध्यम वर्गीय क्षेत्र के 21 सामुदायिक केन्द्रों पर टीवी सेट रखवाकर इसके प्रसारण की विशेष व्यवस्था करवाई थी। ऐसे में तब दूरदर्शन से कोई बड़ी उम्मीद भला कैसे रखी जा सकती थी। हालाँकि जब 15 अगस्त 1965 को दूरदर्शन पर समाचारों का एक घंटे का नियमित हिंदी बुलेटिन आरम्भ हुआ तब दूरदर्शन में लोगों की कुछ दिलचस्पी बढती दिखाई दी। इसके बाद दूरदर्शन पर 26 जनवरी 1967 को किसानों को खेती बाड़ी आदि की ख़ास जानकारी देने के लिए दूरदर्शन पर ‘कृषि दर्शन’ नाम से एक कार्यक्रम शुरू किया गया। इसी दौरान दूरदर्शन पर नाटकों का प्रसारण भी शुरू किया गया। लेकिन दूरदर्शन की लोकप्रियता में बढ़ोतरी तब हुई जब इसमें शिक्षा और सूचना के बाद मनोरंजन भी जुड़ा।

 

असल में जब 2 अक्टूबर 1972 को दिल्ली के बाद मुंबई केंद्र शुरू हुआ तो मायानगरी के कारण इसका फिल्मों से जुड़ना स्वाभाविक था। मनोरंजन के नाम पर दूरदर्शन पर 70 के दशक की शुरुआत में ही एक एक करके तीन शुरुआत हुईं। एक हर बुधवार आधे घंटे का फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम चित्रहार शुरू किया गया। दूसरा हर रविवार शाम एक हिंदी फीचर फिल्म का प्रसारण शुरू हुआ। साथ ही एक कार्यक्रम ‘फूल खिले हैं गुलशन गुलशन’ भी शुरू किया गया। इस कार्यक्रम में फिल्म अभिनेत्री तब्बसुम फिल्म कलाकारों के इंटरव्यू लेकर उनकी जिंदगी की फ़िल्मी बातों के साथ व्यक्तिगत बातें भी दर्शकों के सामने लाती थीं। तब देश में फिल्मों की लोकप्रियता तेजी से बढ़ चुकी थी। लेकिन सभी के लिए सिनेमा घर जाकर सिनेमा देखना संभव नहीं था,ऐसे में जब यह सब दूरदर्शन पर आया तो दर्शकों की मुराद घर बैठे पूरी होने लगी। यूँ यह वह दौर था जब 1970 में देश भर में मात्र 24838 टीवी सेट थे। जिनमें सामुदायिक केन्द्रों में सरकारी टीवी सेट के साथ कुछ अधिक संपन्न व्यक्तियों के घरों में ही टीवी होता था। ऐसे में तब अधिकांश मध्यम वर्ग के लोग भी अपने किसी संपन्न पडोसी या रिश्तेदार के यहाँ जाकर बुधवार का चित्रहार और रविवार की फिल्म देखने का प्रयास करते थे।

 

सीरियल युग से आई टीवी में क्रांति

 

समाचार, चित्रहार और फिल्मों के बाद दूरदर्शन में दर्शकों की दिलचस्पी तब बढ़ी जब दूरदर्शन पर सीरियल युग का आरम्भ हुआ। यूँ तो दूरदर्शन पर कभी कभार सीरियल पहले से ही आ रहे थे।  लेकिन सीरियल के इस नए मनोरंजन ने क्रांति का रूप तब लिया जब 7 जुलाई 1984 को ‘हम लोग’ का प्रसारण शुरू हुआ।  निर्मात्री शोभा डॉक्टर, निर्देशक पी कुमार वासुदेव और लेखक मनोहर श्याम जोशी के ‘हम लोग’ ने दर्शको पर अपनी ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि हमारे सामाजिक परिवेश, दिनचर्या और आदतों तक में यह बड़ा परिवर्तन साबित हुआ, जिससे हम सब की दुनिया ही बदल गयी। ‘हम लोग’ के कुल 156 एपिसोड प्रसारित हुए लेकिन इसका आलम यह था कि जब इसका प्रसारण होता था तब कोई मेहमान भी किसी के घर आ जाता था था तो घर वाले उसकी परवाह न कर अपने इस सीरियल में ही मस्त रहते थे। लोग शादी समारोह में जाने में देर कर देते थे लेकिन ‘हम लोग’ देखना नहीं छोड़ते थे।   ‘हम लोग’ और दूरदर्शन की लोकप्रियता का प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि सन 1970 में देश में जहाँ टीवी सेट की संख्या 24838 थी ‘हम लोग’ के बाद 1984 में वह संख्या 36,32,328 हो गयी।

‘हम लोग’ का दर्शकों पर जादू देख दूरदर्शन ने 1985 में ही हर रोज शाम का दो घंटे का समय विभिन्न सीरियल के नाम कर दिया। जिसमें आधे आधे घंटे के 4 साप्ताहिक सीरियल आते थे। सभी सीरियल को 13 हफ्ते यानी तीन महीने का समय दिया जाता था। उसके बाद वह जगह किसी नए सीरियल को दे डी जाती थी। सिर्फ किसी उस सीरियल को कभी कभार 13 और हफ़्तों का विस्तार दे दिया जाता था, जो काफी लोकप्रिय होता था या फिर जिसकी कहानियां कुछ लम्बी होती थीं। इस दौरान दूरदर्शन पर बहुत से ऐसे सीरियल आये जिन्होंने दर्शकों पर अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी। लेकिन दूरदर्शन की इस लोकप्रियता को तब और भी पंख लग गए जब दूरदर्शन ने 1987 में ‘रामायण’ महाकाव्य पर सीरियल शुरू किया। फिल्म निर्माता रामानंद सागर द्वारा निर्मित निर्देशित ‘रामायण’ सीरियल ने टीवी की लोकप्रयता को एक दम एक नया शिखर प्रदान कर दिया। जब रविवार सुबह ‘रामायण’ का प्रसारण होता था तो सभी सुबह सवेरे  उठकर, नहा धोकर टीवी के सामने ‘रामायण’ देखने के लिए ऐसे बैठते थे जैसे मानो वे मंदिर में बैठे हों। ‘रामायण’ के उस प्रसारण के समय सभी घरों में टीवी के सामने होते थे तो घरों के बाहर सुनसान और कर्फ्यू जैसे नज़ारे दिखते थे। बाद में ‘रामायण’ की लोकप्रियता से प्रभावित होकर दूरदर्शन ने अगले बरस एक और महाकाव्य ‘महाभारत’ का प्रसारण शुरू कर दिया। फिल्मकार बीआर चोपड़ा द्वारा बनाए गए इस सीरियल ने भी जबरदस्त लोकप्रियता पायी।

दूरदर्शन के पुराने लोकप्रिय सीरियल को याद करें तो हम लोग, रामायण और महाभारत के अतिरिक्त ऐसे बहुत से सीरियल रहे जिन्होंने सफलता,लोकप्रियता का नया इतिहास लिखा। जैसे यह जो है जिंदगी, कथा सागर, बुनियाद, वागले की दुनिया,खानदान, मालगुडी डेज़, करमचंद, एक कहानी,श्रीकांत, नुक्कड़, कक्का जी कहिन, भारत एक खोज, तमस, मिर्ज़ा ग़ालिब,निर्मला, कर्मभूमि, कहाँ गए वो लोग, द सोर्ड ऑफ़ टीपू सुलतान, उड़ान, रजनी, चुनौती, शांति, लाइफ लाइन ,नींव, बहादुर शाह ज़फर, जूनून, स्वाभिमान, गुल गुलशन गुलफाम, नुपूर, झरोखा, जबान संभाल के, देख भाई देख,तलाश और झांसी की रानी आदि।

 

एक ही चैनल ने बरसों तक बांधे रखा

 

यह निश्चय ही सुखद और दिलचस्प है कि आज चाहे देश में कुल मिलाकर 800 से अधिक उपग्रह-निजी चैनल्स का प्रसारण हो रहा है। जिसमें मनोरंजन के साथ समाचार चैनल्स भी हैं तो संगीत, सिनेमा, खेल स्वास्थ्य, खान पान, फैशन, धार्मिक, आध्यात्मिक और बच्चों के चैनलस भी हैं तो विभिन्न भाषाओँ और प्रदेशों के भी। लेकिन एक समय था जब अकेले दूरदर्शन ने यह सारा ज़िम्मा उठाया हुआ था। दूरदर्शन का एक ही चैनल समाचारों से लेकर मनोरंजन और शिक्षा तक की सभी कुछ दिखाता था। जिसमें किसानों के लिए भी था बच्चों और छात्रों के लिए भी, नाटक और फ़िल्में भी थीं तो स्वास्थ्य और खान पान की जानकारी के साथ कवि सामेलन भी दिखाये जाते थे और नाटक भी। मौसम का हाल होता था और संगीत का अखिल भारतीय कार्यक्रम भी। क्रिकेट, फुटबाल सहित विभिन्न मैच का प्रसारण भी होता था तो स्वंत्रता और गणतंत्र दिवस का सीधा प्रसारण भी। धरती ही नहीं अन्तरिक्ष तक से भी सीधा प्रसारण दिखाया जाता था जब प्रधानमन्त्री के यह पूछने पर कि ऊपर से भारत कैसा दिखता है, तब भारतीय अन्तरिक्ष यात्री राकेश शर्मा के ‘सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दुस्तान हमारा, कहने पर पूरा देश गर्व से रोमांचित हो गया था। बड़ी बात यह है कि दूरदर्शन के इस अकेले चैनल ने सही मायने में सन 1990 के बाद के कुछ बरसों तक भी अपना एक छत्र राज बनाए रखा। यूँ कहने को दूरदर्शन का एक दूसरा चैनल 17 सितम्बर 1984 को शुरू हो गया था। लेकिन सीमित अवधि और सीमित कार्यक्रमों वाला यह चैनल दर्शकों पर अपना प्रभाव नहीं जमा पाया जिसे देखते हुए इसे कुछ समय बाद बंद कर देना पड़ा। बाद में 2 अक्टूबर 1992 में जहाँ जी टीवी से उपग्रह निजी हिंदी मनोरंजन चैनल की देश में पहली बड़ी शुरुआत हुई वहां 1993 में दूरदर्शन ने मेट्रो चैनल की भी शुरुआत की। तब निजी चैनल्स के साथ मेट्रो चैनल को भी बड़ी सफलता मिली और दर्शकों को नए किस्म के नए रंग के सीरियल आदि काफी पसंद आये। लेकिन उसके बाद देश में सभी किस्म के चैनल्स की बाढ़ सी आती चली गयी। इससे दूरदर्शन को कई किस्म की चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा। पहली चुनौती तो यही रही कि एक पब्लिक ब्रॉडकास्टर होने के नाते दूरदर्शन के सामजिक जिम्मेदारियां हैं। दूरदर्शन मनोरंजन के नाम पर निजी चैनल्स की तरह दर्शकों को कुछ भी नहीं परोस सकता।

 

दूरदर्शन की महानिदेशक सुप्रिया साहू भी कहती हैं- यह ठीक है कि दूरदर्शन एक पब्लिक ब्रोडकास्टर है लेकिन मैं समझती हूँ कि यह सब  होते हुए भी दूरदर्शन अपनी भूमिका अच्छे से निर्वाह कर रहा है। दूरदर्शन का आज भी दर्शकों में अपना अलग प्रभाव है, दूरदर्शन अपने दर्शकों को साफ सुथरा और उद्देश्य पूर्ण मनोरंजन तो प्रदान कर ही रहा है लेकिन दर्शकों को जागरूक करने की भूमिका में दूरदर्शन सभी से आगे है। बड़ी बात यह है देश में कुछ निजी चैनल्स मनोरंजन और समाचारों के नाम पर जो सनसनीखेज वातावरण तैयार करते हैं दूरदर्शन हमेशा इससे दूर रहकर स्वस्थ और सही प्रसारण को महत्व देता है। हाँ  दूरदर्शन के सामने जो चुनौतियाँ हैं उनसे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन दूरदर्शन के इस 58 वें स्थापना दिवस पर मैं सभी को यह विश्वास दिलाती हूँ कि आज दूरदर्शन अपनी सभी किस्म की चुनौतियों से निबटने के लिए स्वयं सक्षम है। आज हमारे पास विश्व स्तरीय तकनीक है हम दुनियाभर में जाकर अपने एक से एक कार्यक्रम बनाते हैं और दिखाते हैं.निजी चैनल जिन मुद्दों पर उदासीन रहते हैं वहां हम उस सब पर बहुत कुछ दिखाते हैं, जैसे किसानों पर, स्वच्छता पर, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर। कला पर संस्कृति पर। आज दूरदर्शन के देश में कुल 23 चैनल्स हैं जिनमें 16 सेटेलाइट्स चैनल हैं और 7 नेशनल चैनल्स। जिससे दूरदर्शन आज महानगरों से लेकर छोटे नगरों,कस्बों और गाँवों तक पूरी तरह जुड़ा हुआ है। हमारे कार्यक्रम तकनीक और कंटेंट दोनों में उत्तम हैं। इस सबके बाद भी यदि कहीं कोई कमी मिलती है तो हम उसे दूर करेंगे। समय के साथ अपने कार्यक्रमों की निर्माण गुणवत्ता में जो आधुनिकीकरण करना पड़ेगा, उसे भी हम करेंगे। कुल मिलाकर उद्देश्य यह है कि हम अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से भी पीछे नहीं हटेंगे और दर्शको का दूरदर्शन में भरोसा भी कायम रखेंगे।”

 

दूरदर्शन में दर्शकों का भरोसा कायम रहे इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। मेरा तो दूरदर्शन से अपना भी व्यक्तिगत लगाव है। पहला तो इसलिए ही कि मैं भी देश के लाखों करोड़ों लोगों की तरह  बचपन से दूरदर्शन को देखते हुए बड़ा हुआ हूँ। लेकिन इसके साथ दूरदर्शन से मेरा विशेष और अलग लगाव इसलिए भी है कि मैंने ही देश में सबसे पहले दूरदर्शन पर नियमित पत्रकारिता शुरू की। सन 1980 के दशक के शुरुआत में ही मुझे इस बात का अहसास हो गया था कि दूरदर्शन जल्द ही घर का एक सदस्य बन जाएगा। जब दूरदर्शन पर ‘हम लोग’ से भी पहले ‘दादी माँ जागी’ नाम से देश का पहला नेटवर्क सीरियल शुरू हुआ तो मैंने उसकी चर्चा देश के विभिन्न हिस्सों में दूर दराज तक होते देखी। मुझे लगा कि एक सीरियल एक ही समय में पूरे देश में यदि देखा जाएगा तो यह टीवी मीडिया क्रांति ला देगा। तब हम कोई फिल्म देखते थे तो वह अलग अलग समय में अलग अलग दिनों में देखते थे मगर रात 8 या 9 बजे राष्ट्रीय प्रसारण वाला सीरियल एक साथ एक ही समय में पूरा देश देख लेता था। उसके बाद उसमें दिखाए दृश्य अगले दिन सभी की चर्चा का विषय बने होते थे। यह ठीक है कि अब अलग अलग सैंकड़ों चैनल्स आने से स्थितियों में बदलाव हुआ है लेकिन दूरदर्शन ने देश को एक साथ जोड़ने, लोगों को जागरूक करने, शिक्षित करने और उन्हें मनोरंजन प्रदान करने का जो कार्य किया है उसका आज भी कोई सानी नहीं है।

Significant for Essay Paper Writing, UPSC/PCS.

NanoPhone, ‘Smallest Phone in the World’ Now, Launched in India

The e-commerce site Yerha.com has announced the launch of a phone dubbed Elari NanoPhone C. The company touts this device to be the ‘smallest phone in the world’. In the world of smartphones, this one comes as a feature phone with pretty basic specs.

It is claimed to be ultra compact stylish and anti-smart mobile phone or in other words, smartphone that retains certain features of smartphone but provide opportunity to user of being completely disconnect to maintain healthy and active lifestyle .

According to the company, the NanoPhone C is the world’s smallest GSM phone that is almost the size of a credit card. The Elari NanoPhone C is priced at Rs. 3,940 in India and is available in three color options such as Silver, Rose Gold, and Black. In the official statement, the company claims the device to be a stylish, anti-smart, and ultra-compact mobile phone…

Moreover, Talking about the NanoPhone C weighs in around 30 grams and measures 7.6mm in thickness. The device has just a 1-inch TFT display with a resolution of 128×96 pixels. Running on RTOS, the device makes use of a MediaTek MT6261D chipset, 32MB RAM and 32MB storage that can be further expanded up to 32GB using a microSD card.

The Elari NanoPhone C is a dual-SIM smartphone supporting two micro SIM cards. The device gets the power from a 280mAh battery that can give it up to 4 hours of talk time and up to 4 days of standby time. It has an MP3 player, voice recorder, FM radio, a micro USB port and a 3.5mm audio jack. Also, there is Bluetooth to connect to Android and iOS devices in order to make and answer calls from the connected smartphone. There is a Magic Voice function for users to make prank calls to their friends…

Written By: Abhinaya Prabhu…

IAS Prelims+Mains 2017-18 and Current Affairs by Dr. Ravi Agrahari to IASmind

Dr. Ravi Agrahari : My current Guide and Ex-Prof. at Rau’s IAS Study Circle, Scientist at IIT, Delhi. Importantly, he is a current intellectual Scientist on IASmind.com for Science and Technology, Disaster Management, Environment, Ecology and Biodiversity. See, Environment & Ecology For IAS Main’s & PT 2016-17Disaster Management For IAS Main’s 2016-17 Model Solved Questions. He also deals with huge IAS institutions as well as Sites. Here is the links and video which is given by Agrahari to IASmind

Updates, For 2017-18. 

Today, lecture video sent by him with the source of Kumar Bhaskar to IASmind.




Science & Tech. for IAS Main’s 2016-17

Disaster Management For IAS Main’s 2016-17 Model Solved Questions

Updates, For 2017-18.



ISRO Makes World History, launched104+ satellites in Single rocket

ISRO Makes World History, launches 104+ satellites in Single rocket;

Trilok Singh, Firstly, it is a very courageous and well planned decision of ISRO to launch 104+satellites at once/in single rocket. Yes, we all know that, ISRO have experienced scientists and they are well aware of the benefits and drawbacks of launching 104+ satellites at once. Yes, IT WILL BE A PROUD MOVEMENT

Secondly, all the 104 satellites are not of ISROs, or even of India for that matter. Only three belongs to India. while Rest of 101 satellites belong to different countries.

Moreover, Prime Minister Narendra Modi has often hailed India’s budget space technology, quipping in 2014 that a rocket that launched four foreign satellites into orbit had cost less to make than Hollywood film “Gravity”.

Written by- Trilok Singh and airya Vayada, Citizen space scientist

Today, ISRO launched 104+ satellites in single rocket. Indian Space Research Organisation’s (ISRO) workhorse Polar Satellite Launch Vehicle (PSLV) will carry a record 104 satellites in a single mission on 15 February from the space centre at Sriharikota in Andhra Pradesh. PSLV-C37/Cartosat-2 Series Satellite Mission is scheduled to be launched on February 15, 2017 at 9.28 hours IST from Sriharikota.

The PSLV, in its 39th flight (PSLV-C37), will launch the 714kg Cartosat-2 series satellite for earth observation along with 103 co-passenger satellites, together weighing about 664kg at lift-off. It will be launched into a 505km polar Sun Synchronous Orbit (SSO).

ISRO said the co-passenger satellites comprise 101 nano- satellites, one each from Israel, Kazakhstan, the Netherlands, Switzerland, United Arab Emirates (UAE) and 96 from United States of America (USA), as well as two from India.

The main payload of this launch is;

“Today, the thirty-ninth flight of the Polar Satellite Launch Vehicle, or PSLV, was primarily tasked with carrying to orbit a Cartosat-2 series reconnaissance satellite for the Indian Government. This was the fifth Cartosat-2 spacecraft to be launched; following the naming convention of previous such satellites it will be Cartosat-2D.

Cartosat-2 is a series of panchromatic Earth imaging satellites, deriving from the original Cartosat-2 spacecraft which was launched in January 2007.

A successor to the earlier Cartosat-1 mission and part of the Indian Remote Sensing (IRS) program, Cartosat-2 was a high-resolution imaging spacecraft operated by the Indian Space Research Organisation (ISRO).

Subsequent spacecraft in the series have been launched for the Indian armed forces to establish a constellation of military reconnaissance satellites. The Cartosat-2A, 2B and 2C satellites were launched in April 2008, July 2010 and June 2016 respectively.

In addition to its panchromatic imager, Cartosat-2D is also equipped with a multispectral imaging payload which was introduced to the series with the previous mission, Cartosat-2C.

Based on IRSO’s IRS-2 bus, Cartosat-2D has a mass at launch of 714 kilograms (1,570 lb) and is expected to operate for at least five years.

The spacecraft will go into a circular sun-synchronous orbit at an altitude of 505 kilometers (314 miles, 273 nautical miles), with 97.46 degrees inclination, completing one revolution every 94 minutes and 43 seconds. The PSLV deployed Cartosat-2D – along with its 103 co-passengers – slightly above this orbit.

Cartosat-2D was joined on its ride to orbit by a pair of ISRO research satellites named ISRO Nanosatellite 1A and 1B (INS-1A and 1B) and 101 CubeSats.”

Other two Indian satellites are experimental CubeSats of ISRO.

The foreign co-passenger satellites comprise 101 nano satellites, one each from Israel, Kazakhstan, The Netherlands, Switzerland, the United Arab Emirates and remaining 96 from the United States.

More Importantly, The satellites from Israel, Kazakhstan, The Netherlands, Switzerland, and the United Arab Emirates will perform various functions as assigned by their respective countries. Their functionality is not known to ISRO. ISRO is merely placing them into their designated orbit.

Out of 96 satellites from the USA, 88 are from a single company named Planet who is sending Cubesats aka Dove satellites.

Recent Development and success story

Recently, in June 2016, ISRO launched about 20 satellites at once with only 1 satellite failed to be placed in its orbit and 1 satellite placed in its orbit with partial failure. 


Rest of the satellites have been placed in different orbits successfully and they are working absolutely fine. Like this mission, launching 104 satellites is a bigger version of this mission. If ISRO can successfully place 36 satellites (all satellites launched so far, including one with partial failure) then it is able to place 104 satellites in their orbits too. It is neither an easy nor an impossible task.

Moreover, The recent success stories of ISRO should be sufficient to convince us that launching 104 satellites at once will also be a success and it will glorify our status in space science. The scientists here are dedicated and courageous enough to take on any challenge. This is one of the reasons why I aspire to be a scientist at ISRO. Read More.. ISRO launches record 20 Satellites : Now PSLV-C34 launch.

Related Questions, All you need to know;

If two satellites revolving in the same orbit, have the same speed, then how is the ISRO planning to send 104+ satellites into space?

According to my word, There is this game called Simple Rockets for android users in play store which deals with all the technology in space travel. It’s highly addictive and got really good graphics. You can also learn from it anything related to space, launching rockets and satellites both from earth and other planets too. Also you can connect to other satellites and build your own space station. It’s a paid app but you can download it online for free from APK4Fun – Download APK for Fun Android Apps & Games . Also you can experience yourself how hard it is to launch 104+ satellites.



Is ISRO launched 104+ satellite in single attempt?

Exactly, you heard it right. The Indian Space Research Organisation (ISRO) will set a record when it launches 104+ satellites in one go on a single rocket in the first week of February. The satellites will be separated from the launch vehicle in different directions. The separation angle and time of separation will be such that one satellite will not collide with another.

More Specifically, The satellite separated from the launch vehicle will have a relative velocity of one meter per second. So after 1,000 seconds the distance between a satellite and the rocket will be 1,000 meters. “The satellite that gets launched first will move at a relatively faster velocity than the next satellite that is launched. Due to different relative velocities, the distance between the satellites will increases continuously but the orbit will be the same.

Even one degree difference in separation angle combined with relative velocity will ensure that no two satellites would collide. The satellites will be injected into orbit at different locations at different angles, at different times and different orientations.

Finally, ISRO is also mulling the idea of missions to Jupiter and Venus, according to PTI. Prime Minister Narendra Modi has often hailed India’s budget space technology, quipping in 2014 that a rocket that launched four foreign satellites into orbit had cost less to make than Hollywood film “Gravity”.

What should everyone know about the ISRO’s PSLV-C37 mission carrying 104 satellites?

  • Previous record for launch of maximum number of satellites in a single flight was 37 by Russian rocket Dnepr [ Russian Dnepr rocket lofts record haul of 37 satellites ]
  • Out of the 104 satellites , 103 are nano satellites (one each from Israel, Kazhakstan , UAE, Netherlands, Switzerland, two from India and ninety six nano satellites from the USA) . [ PSLV-C37 / Cartosat -2 Series Satellite – Curtain Raiser Video ]
  • All nano satellites separated between the time span between 18 minute 32 seconds and 28 minute 42 seconds [ Prasar Bharati on Twitter ] . The satellites were released from the rocket with the help of a spring mechanism
  • India launched two nano satellites (INS1 A and INS1 B) . These are experimental navigation satellites. Both of them weigh 9 kg each.
  • The total weight of all these satellites will be ~ 1370 Kg.
  • The imagery of Cartosat-2 series satellite will be useful cartographic applications, urban and rural applications, coastal land use and regulation, utility management like road network monitoring, water distribution, creation of land use maps, precision study, change detection to bring out geographical and man made features and various other Land Information System (LIS) and Geographical Information System (GIS) applications. Cartosat -2 weights 714 kg.
  • 88 of the satellites belong to a US company called ‘Planet’. These will be the largest satellite constellation ever to reach orbit. With these satellites the company will able to image the earth everyday.
  • 8 of the satellites belonging to another US company called spire. Lemur -2 will also be part of the world’s first commercial weather satellite network.

What is the problem?

Launching 104+ satellites at once is not a big problem. The problem arises when the PSLV-C37 has to place each and every satellites in their respective orbits. As ISRO launched satellites of different countries, these satellites will be placed in different orbits so the scientists at ISRO have to monitor each and every satellite and they need to calculate the data very precisely.

Why ISRO? Why “NOT” NASA or SpaceX?

The PSLV does not have the capacity to launch very heavy payloads, but the relatively small rocket is exactly what the world needs right now. Private companies around the world are racing to build smaller rockets to launch the smaller satellites. Space agencies are building racks to house a number of satellites in a single launch vehicle. ISRO already has the capabilities of launching smaller satellites. The proliferation of nanosatellites is ideal for ISRO launches. ISRO can increase the number of satellites in each mission, by packing in an increasing number of satellites into each launch. The “work horse” rocket of the Indian space agency has a flawless record spanning over two decades, and has seen a spike in spaceflights in the XL-configuration lately.

Antrix, the commercial arm of ISRO, provides launch services much cheaper than competition. The US based SpaceX and the French Arianespace or NASA simply cannot compete with the prices that are offered by ISRO. In fact, ISRO provides satellite launch services at such a low cost, that the American private launch industry is threatened by ISRO, and has lobbied for a policy that prevents American companies from using Indian launch vehicles such as the PSLV. However, as the nano-satellites keep getting made, and are more useful in space than on the ground, there are waivers given to companies on an individual basis, to allow them to use ISRO launch vehicles.

The PSLV is reliable, and has failed entirely only on its maiden flight in 1993, and partially in a 1997 flight. A Falcon 9 launch costs $57 million (about Rs 381 crore). A Russian Proton launch costs $68 million (roughly Rs 455 crore). Launches of the Japanexe H-IIA, the Chinese Long March, European Ariane-5 and American Atlas V each cost about $100 million (around Rs 669.2 crore). An Isro PSLV launch by comparison, costs a paltry $15 million (roughly Rs 100 crore). Isro will recover about half of the cost of the PSLV-C37 spaceflight because of the number of foreign satellites on board.



Indian Space Research Organisation (ISRO), “We have tentatively decided to launch the satellites at one go into the sun-synchronous orbit, about 500 km above the earth,” the

Trilok Singh, IT WILL BE A PROUD MOVEMENT.

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DRDO’s valentines gift to IAF: A drone, cruise missile detecting system

DRDO Successfully tests exo-atmospheric ballistic Missile Interception

Note : If any corrections are required on above post so please inform me at triloksingh@iasmind.com or ktrilok92@gmail.com.

Best Regard

CEO, Trilok Singh.

DRDO’s valentines gift to IAF: A drone, cruise missile detecting system

Dr S Christopher, Chairman DRDO said that ‘Eye in the Sky’, will be inducted during Aero India 2017.

On February 14, the day Aero India 2017 begins, the IAF will be the proud owner of its very own indigenous all-weather airborne early warning and control system popularly known as the AEW&C.This aerial platform is meant to be a force multiplier that will guide the IAF’s fighter aircraft during combat. It will have the capability to detect incoming fighters, cruise missiles and even drones from both Pakistan and China.





For Dr. Christopher, Chairman, DRDO it will be a fine day indeed. He was earlier the Programme Director (airborne early warning and control system) and Director, Centre for Air-Borne Systems in the DRDO before being elevated to the topmost post.

Speaking exclusively to India Today, he said that his association with the early warning system programme goes back to 1985 when it all started. He also had a narrow escape having flown on the same test aircraft as a flight engineer that crashed in January 1999. ‘I flew on that same test aircraft, the previous sortie, the last but one sortie before it crashed,’ he told India Today.

The indigenous AEW&C system has been developed by Bengaluru based CABS and integrated onto a Brazilian built Embraer-145 aircraft. It is equipped with a 240-degree coverage radar and can detect, identify and classify threats in the surveillance area and also act as a Command and Control Centre to support Air Defence operations.

Dr. CP Ramanarayanan, Director General – Aeronautical Systems (Aero) participated in the final trials of the AEW&C. ‘I was onboard this flight in Jodhpur and it was so heartening to see all the functional performance requirements were met meticulously,’ he says. According to him the users (IAF) observed that this was such a trial they have never undergone. So while the second AEW&C will be handed over to the IAF in a few months time, the third which was initially to be with CABS, will also be handed over to the IAF.



LOTS OF CATCHING UP TO DO

China today has more than 20 AWACS and Pakistan has 8 AWACS, India on the other hand has just this one AEW&C and 3 Phalcon systems. To play catch up, in March 2016, the Defence Acquisition Council cleared the building of 2 AWACS-India.

These systems will be much more powerful and capable than the AEW&C and will involve mounting an indigenous 360-degree coverage AESA radar on an Airbus A-330 jet. ‘As far as the functionality is concerned, both are identical. However, the new one is much more capable with extended range and better angular coverage,’ Dr. S Christopher says. The requirement of the IAF is for 8 AWACS-I aircraft.




As of today, Dr. Christopher says the file will be moved to the Cabinet Committee on Security and they are hoping to secure clearance anytime soon with a developmental timeframe of close to 7 years.

Trilok Singh, With the help of Author Nolan Pinto, it Posted by Bijin Jose.



DRDO Successfully tests exo-atmospheric ballistic Missile Interception




TRILOK SINGH AT DRDO. NEW DELHI, INDIA.

Today, extraordinary achievement done by our DRDO scientist team which really strengthen the our defense mechanism and also helps to counter the security threats at Air to Air level. Yes, this is a valentine gift by the DRDO to our defence. The interceptor was launched from Abdul Kalam Island or Wheeler Island of ITR at about 7.45am, said a top DRDO officials to IASmind.com.



Moreover, The Defence Research and Development Organisation (DRDO) on february 11, 2017, successfully tested an exo-atmospheric missile interception as part of the ballistic missile defence programme. The interceptor is based on the nuclear-capable Prithvi missile.

Indian ballastic missile defence programme is a double-tiered system consisting of two interceptor missiles, namely the Prithvi Air Defence (PAD) missile for high altitude interception, and the Advanced Air Defence (AAD) Missile for lower altitude interception.

Talking about credibility, this defence system has a hit probability of 98.5 %. Tested successfully against ballastic missile during PADE (exercise conducted to test this system). And have been successfully intercepted all missile launched from surface and ship. It was being tested against Prithvi 2, which have feature measures to decieve ( to avoid or counter measure ) anti ballastic missile.

With the help of Inertial Guidance and IR Seeker the missile moved for the interception. All events were monitored in real-time by the Telemetry/Range Stations, at various other locations.



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SpaceX launches space Station docking port for NASA

SpaceX launched a critical space station docking port for astronauts early on Monday, along with a DNA decoder for high-flying genetic research.

As an extra treat, the company brought its leftover first-stage booster back to Cape Canaveral Air Force Station for a vertical landing only the second such land landing for an orbital mission and the ultimate in recycling. Twin sonic booms rocked the night, incoming shuttle-style.

The unmanned Falcon rocket streaked through the middle-of-the-night darkness, carrying 5,000 pounds of food, experiments and equipment for the International Space Station. imageThe orbiting outpost was soaring over the North Atlantic at lift-off, its six residents asleep.

It was SpaceX’s second shot at delivering a new-style docking port for NASA. The last one went up in smoke over the Atlantic last year, a rocket accident casualty.

NASA needs this new docking setup at the International Space Station before Americans can fly there in crew capsules set to debut next year. SpaceX is building astronaut-worthy versions of its Dragon cargo ships, while Boeing which makes these docking ports is working on a crew capsule called Starliner. The pair would dock to this ring and another due to fly in a year.

The Dragon and its latest shipment are due Wednesday at the 250-mile-high outpost.

NASA’s space station program manager Kirk Shireman expected to be “sweating bullets without a doubt” at lift-off, as always. He said all the cargo is precious, but really wants this docking port “up there safe and sound.”

SpaceX, meanwhile, had its sights not only on orbit, but also on the ground.

SpaceX brought its leftover first-stage booster back to Cape Canaveral Air Force Station, just a couple miles from where it lifted off. The company has now pulled off five vertical booster landings since December, three on an ocean platform and two on land. SpaceX employees at company headquarters in Hawthorne, California, cheered loudly and applauded when the 15-story booster touched down smoothly.

SpaceX founder and chief executive Elon Musk wants to refly his rockets to shave launch costs the ultimate in recycling. The boosters normally are ditched at sea. The company hopes to launch its first recovered rocket this fall.

The station’s two Americans will perform a spacewalk in August to hook up the new docking ring, about 5 feet across and 3 1/2 feet tall. Another port cobbled together from spare parts will replace the one lost in the June 2015 launch accident.

NASA went with private companies to supply the space station in the wake of the shuttle retirement five years ago this week.

Source:- The Hindu

Importance:- GS3 Sci and tech.