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दूरदर्शन के बेमिसाल 60 साल

टेलीविजन का आविष्कार यूँ तो ‘जॉन एल बिलियर्ड’ ने 1920 के दौर में ही कर दिया था। लेकिन भारत में यह तकनीक तब पहुंचा जब 15 सितम्बर 1959 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने दिल्ली में एक प्रसारण सेवा “दूरदर्शन” का उद्घाटन किया। अतः दूरदर्शन पर आज ही के दिन यानी 15 सितंबर, 1959 को पहला प्रसारण हुआ था। आज दूरदर्शन अपने जीवन के 60 वर्ष (सितंबर, 2019 में ) पूर्ण कर चुका है। हालांकि, आरंभिक वर्षों में इसका विकास बहुत संकुचित था, तथा इसके दायरे में दिल्ली के आसपास के लगभग 40 किलोमीटर तक के ही इलाके आते थे। तब सरकार ने दिल्ली के निम्न और माध्यम वर्गीय क्षेत्र के 21 सामुदायिक केन्द्रों पर टीवी सेट रखवाकर इसके प्रसारण की विशेष व्यवस्था करवाई थी।

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आरंभिक वर्षों में इसके पास केवल 180 टेलिविजन सेट्स थे। लेकिन 10 वर्षों के अंदर ही इसके टेलिविजन सेट्स की संख्या बढ़कर 1,250 हो गई और 1977 तक यह संख्या करीब 2.5 लाख तक पहुंच गई। 1972 तक टीवी सर्विस को मुंबई और अमृतसर तक विस्तार दिया गया। 1975 तक भारत के सिर्फ 7 शहरों में टीवी सर्विस उपलब्ध थी और भारत में टीवी का अकेला दूरदर्शन ही सर्विस प्रोवाइडर था। दूरदर्शन के लगभग 60 से ज्यादा चैनल्स हैं जिनमें डीडी1, डीडी2, डीडी दमन और दिउ, डीडी अरुणाचल प्रदेश, डीडी इंग्लिश, डीडी गोवा आदि शामिल है। और ‘डीडी इंडिया’ अभी लगभग 146 देशों में मौजूद है। साल 1982 में, ‘रंगीन दूरदर्शन’ की शुरूआत हुई और 3 नवंबर 2003 में दूरदर्शन का 24 घंटे लगातार चलने वाला समाचार चैनल बन गया।

महत्वपूर्ण रूप से, सांस्कृतिक चैनल जैसे ‘डीडी भारती’ को दूरदर्शन ने 26 जनवरी 2002 में आरंभ किया गया। सन 2004 में 16 दिसंबर को ‘डायरेक्ट टू होम’ सेवा को दर्शकों के टेलीविजन सेट पर मुफ्त में दिखाया गया, जिसकी सेवा आज भी बरकरार है। इस तरह बदलते परिदृश्य और दर्शकों की मांग को देखते हुए दूरदर्शन ने खुद को व्यापक स्तर से आगे विस्तार किया। इसके बढ़ते कदम को देखते हुए प्राइवेट चैनलों ने भी भारत में अपनी दस्तक दी। इस कदम में, 2 अक्तूबर सन् 1992 में पहली बार प्राइवेट चैनल ‘जी टीवी’ का प्रसारण हुआ। यह चैनल नए कार्यक्रमों के साथ दर्शकों के समक्ष आया। वर्तमान में, देखते ही देखते जी टीवी ने दूरदर्शन की लोकप्रियता जी टीवी ले जाने लगा। दूरदर्शन की ही तरह जी टीवी ने भी वक़्त के साथ अपने काफी चैनल शुरू कर दिए, इसके बाद दर्शकों ने दूरदर्शन देखना मानो छोड़ ही दिया हो। जैसे-जैसे वक़्त बीतता गया दूरदर्शन पीछे छूटता गया और आखिर में आज वक़्त कुछ ऐसा आ गया है कि 26 जनवरी और 15 अगस्त के अलावा शायद ही कोई दूरदर्शन देखता हो।

हालाँकि, जब 15 अगस्त 1965 को दूरदर्शन पर समाचारों का एक घंटे का नियमित हिंदी बुलेटिन शुरू हुआ तब इसके प्रति लोगों की दिलचस्पी बढ़ती दिखाई देने लगी। इसी दौरान दूरदर्शन पर नाटकों का प्रसारण भी शुरू किया गया। लेकिन इसकी लोकप्रियता में बढ़ोतरी तब हुई जब इसमें शिक्षा और सूचना के बाद ‘मनोरंजन’ भी जुड़ा। यथार्थ में, जब 2 अक्टूबर 1972 को दिल्ली के बाद मुंबई केंद्र शुरू हुआ तो ‘मायानगरी’ के कारण इसका फिल्मों से जुड़ना स्वाभाविक था। इस प्रकार समकालीन समय में, दूरदर्शन आगे चलकर जन-सामान्य की जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया है। आज यह रोटी, कपड़ा और मकान के बाद लोगों की चौथी ऐसी आवश्यकता बन गया है कि जिसके बिना जिंदगी एक अधूरी सी कहानी प्रतीत होती है। 

कुछ बदलाव के परिणामस्वरूप, 1 अप्रैल, 1976 को टीवी सर्विसेज को रेडियो से अलग किया गया। हालाँकि, इससे पहले यह “ऑल इंडिया रेडियो” का हिस्सा था। इसके बाद ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन के कार्यालय का प्रबंधन दिल्ली में अलग-अलग महानिदेशकों द्वारा किया जाने लगा। 1982 में यह नैशनल ब्रॉडकास्टर के तौर पर सामने आया और देश के हर हिस्से में पहुंच गया। दूरदर्शन पर जिस कार्यक्रम का सबसे पहले प्रसारण किया गया वह “कृषि दर्शन” था। दूरदर्शन के कुछ लोकप्रिय टीवी शो इस प्रकार थे; रामायण, महाभारत, शक्तिमान, भारत एक खोज, चित्रहार, हम लोग, ये जो है जिंदगी, बुनियाद, करमचंद, ब्योमकेश बख्शी, विक्रम और बेताल, मालगुडी डेज, ओशिन, जंगल बुक, द पीकॉक कॉल्स और यूनिवर्सिटी गर्ल्स आदि।

समाचार, चित्रहार और फिल्मों के बाद दूरदर्शन में दर्शकों की दिलचस्पी तब बढ़ी जब दूरदर्शन पर ‘सीरियल युग’ का आरंभ हुआ। हालाँकि, सीरियल के इस नए मनोरंजन ने क्रांति का रूप तब लिया जब 7 जुलाई 1984 को ‘हम लोग’ का प्रसारण शुरू हुआ। आज हमारे पास विश्व स्तरीय तकनीक है तथा हम दुनियाभर में जाकर अपने एक से एक कार्यक्रम बनाते हैं और प्रकाशित करते हैँ। निजी चैनल जिन मुद्दों पर उदासीन रहते हैं वहां दूरदर्शन इन सभी मुद्दों पर बहुत कुछ प्रकाशित करते हैं, जैसे किसानों पर, स्वच्छता पर, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर, कला और संस्कृति पर आदि। इसलिए दूरदर्शन आज महानगरों से लेकर छोटे नगरों, कस्बों और गाँवों तक पूरी तरह जुड़ा हुआ है। इसके द्वारा चलाये गए कार्यक्रम तकनीकी और कंटेंट दोनों में उत्तम हैं।

डिजिटल क्रांति के इस युग में युवा पीढ़ी को दूरदर्शन का मतलब शायद ही पता हो, लेकिन पिछली पीढ़ी का इसके साथ गहरा नाता रहा है। अतः आने वाली पीढ़ियों को भी इससे ज्ञान अर्जित करना चाहिए। विभिन्न मीडिया जगतों के बढ़ते बाज़ारीकरण के परिणामस्वरूप इसके दर्शकों की संख्यां में भारी गिरावट दर्ज की गयी है। इसलिए, समय के साथ-साथ इसके कार्यक्रमों की निर्माण गुणवत्ता में जो आधुनिकीकरण करना पड़े, उसे करना चाहिए। भारत में यह शिक्षा-प्रसार का बहुत बड़ा माध्यम हो सकता है। वास्तव में इसका प्रयोग आम जनता की “उन्नति और समृद्धि” के लिए ज्ञान की कुंजी के रूप में करना चाहिए, क्यूंकि इसके अनेक कार्यक्रम जन-जागरण करने में प्रबल रूप से सक्षम हैं।

लेखक: त्रिलोक सिंह, युथ दर्पण के सीईओ हैं। स्नाक्तोत्तर (राजनीती विज्ञान, किरोड़ी, दिल्ली विश्वविद्यालय)। वर्तमान में, ISOMES, न्यूज़ 24 में पोस्ट ग्रेजुएट जर्नलिज्म प्रोग्राम कर रहे हैं। 

Copyright, https://triloksingh.academia.edu

About the author

Trilok Singh

CEO at Youth Darpan Media, Post A2Z Social Media, Micro BlogIN, IASmind.com and IJJMC Journal. Research Scholar at School of Journalism and Mass Communication, K.R. Mangalam University. Masters in Political Science, Kirori Mal College, University of Delhi. Masters in Journalism and Mass Communication (MJMC) from Galgotias University.